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‘सरकार बताए, कानफोड़ू शोर की शिकायत कहां

‘सरकार बताए, कानफोड़ू शोर की शिकायत कहां

ज्ञानेश कुमार का चुनाव आयोग फंस गया है और सरकारी मीडिया पूरी ताकत से बचाने में लगा है। वह जो बोल रहा है, वही नईदुनिया के पहले पन्ने पर है और सिर्फ उसे ही खबर बनाया है, जो चुनाव आयोग को बचा सकता है। हेडिंग है-‘हर फैसला सर्वसम्मति से।’ चुनाव आयोग ने तिथि और बिंदुवार बताया- फैसलों पर एकमत थे तीनों आयुक्त। कांग्रेस सहित बाकी ने तीखे हमले किए हैं। राहुल गांधी ने तो लंबी प्रेस कॉन्फ्रेंस की है, इस पन्ने पर नहीं है। राहुल क्या बोले हैं, जानने के लिए कई सारे पन्ने पलटने पड़ेंगे और उसके बाद भी मिलेंगे तो भाजपा के बयान के दबे हुए ही। भाजपा कह रही है कि गांधी परिवार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी को चुनाव आयोग से न जोड़ें। कांग्रेस और राहुल गांधी ने जो कहा है, उसे छोटे में निपटा दिया है कि ज्ञानेश कुमार ने देशद्रोह किया है, इस्तीफा देकर सरकारी गवाह बन जाएं। दैनिक भास्कर ने जरूर हमेशा वाला ही काम किया है और राहुल को ऊपर लगाया है। साथ में भाजपा है कि कांग्रेस पारदर्शी चुनाव से तंग है, लेकिन राहुल की प्रेस कांफ्रेंस सोशल मीडिया पर खूब चल रही है। शायद इसलिए कि पता था, खबरिया चैनलों और समाचार-पत्र के पन्नों पर ज्यादा जगह मिलेगी नहीं, इसलिए अपना तरीका खड़ा कर लिया है और इस भरोसे फिलहाल काम चल रहा है। पत्रिका ने जरूर ऊपर वाले पन्ने की शुरुआत राहुल गांधी से की है और जो जानकारी होना चाहिए, तकरीबन सभी है। भार

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'लता जी को गाना था... रातभर नींद नहीं आई...!'

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'लता जी को गाना था... रातभर नींद नहीं आई...!'

आपने शुभा मुद्गल से रॉक सांग गवाया, ये कैसे संभव हुआ? *दरअसल शुभा मुद्गल के साथ एलबम बनाया था ‘अब के सावन।’ पांच गानों की रिकार्डिंग हो चुकी थी, छठवां बाकी था। मैं घबरा रहा था, क्योंकि वह गाना कुछ अलग था। प्रसून जोशी ने लिखा था। एक दिन शुभा जी बोलीं कि ये छठवां गाना मुझे कब सुनाओगे। मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी कि मैं उन्हें सुनाऊं, तो प्रसून बोले कि जब सुनाना नहीं है, तो संगीत बनाया क्यों। शुभा जी बहुत शॉर्प हैं, समझ गईं कि छठवें गाना में कुछ ऐसा है, जो मुझे बताने में संकोच हो रहा है और एक दिन स्टूडियो में आकर बोलीं कि आज तो गाना सुनकर ही जाऊंगी। मैंने पहले तो माफी मांगी, तो बोलीं कि ऐसा क्या है जो माफी मांग रहे हो। मैंने कहा कि अभी तक सूफी सुनते आए हैं, पर मैंने रॉक सिंगर की कल्पना की है और ये वैसा ही गाना है। उन्होंने गाना सुना और बोलीं कि इसकी रिकार्डिंग एक बार में ही करना, क्योंकि ये हाई-पिच सांग है। जब गाना रिकार्ड हुआ, तो जैसे चमत्कार हो गया। वो गाना था ‘अब के सावन ऐसे बरसे, जिया तरसे…।’ ये शुभा जी का अकेला गाना है, जो उन्होंने रॉक स्टाइल में गाया है। आज के संगीत पर क्या कहेंगे? * कोविड के समय सोनू निगम का फोन आया और बोले कि एक गाना सोशल मीडिया पर बहुत चल रहा है कि ‘भगवान तू है कहां…’ और ये गाना इस कठिन समय में लोगों को बहुत हिम्मत दे रहा है। मेरे कहने का मतलब ये है कि आज जैसा

नकल में अकल की बचत खतरनाक है!

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नकल में अकल की बचत खतरनाक है!

विश्व गुरु बन चुका है भारत। कम-से-कम चुनाव जीतने में तो दुनिया को हमसे सीखने की जरूरत है। हमारे हथकंडे अमेरिका में भी इस्तेमाल हो रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति रेवड़ी बांट रहे हैं। युवाओं को हजारों डॉलर देने का लालच दिया। लाड़ली लक्ष्मियों की तर्ज पर ट्रंप ने लाड़ले लड़कों की फौज बनाने की तैयारी कर ली, जिन्हें ‘डॉलर फेंको, तमाशा देखो’ से रिझा रहे हैं। यह बात और है कि वहां के युवा नाराज हैं और ट्रंप की घूस लेने को तैयार नहीं हैं। ट्रंप ने चुनाव जीतने के लिए मीडिया को काबू करने की कोशिश की है, लेकिन वहां का मीडिया हमारे जैसा बिकाऊ नहीं है। ट्रंप ने उन्हें बंद करने का फरमान जारी किया तो मीडिया अदालत जा पहुंचा। ‘पुष्पा’ के अंदाज में मीडियावालों ने ऐलान कर दिया झुकेगा नहीं…! ट्रंप ने अमेरिकी मीडिया संस्थानों को फर्जी बताया तो ट्रंप को ही ब्लैक लिस्ट में डाल दिया। ना रहेगा बांस ना बनेगा डंडा! चतुराई दिखाते व्हाइट हाउस में ही ट्रंप-टीवी चालू कर दिया है। हमारे यहां तो ‘आकाशवाणी’ और ‘दूरदर्शन’ से यही काम कराया जाता रहा है। अब तो तमाम खबरिया चैनलों को भी इसी काम में लगा दिया है। जन्मदिन से फोटो शूट तक संभाल रहे हैं। छवि हो या कपड़े, बताते हैं कि दाग अच्छे हैं। अगर कोई शब्द गलत हो जाए तो साबित कर देते हैं कि सही है। एंकर भी मतलब को ‘मटलब’ बोलने लगते हैं। जैसा उनका गाना-वैसा इनका बजाना। जिसने इन

‘अंकुर’ से पनपा... वट-वृक्ष हो गया!

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‘अंकुर’ से पनपा... वट-वृक्ष हो गया!

जिस दौर में पर्दे पर ऊंची आवाज, भारी संवाद और मारधाड़ को अभिनय माना जाता था। अनंत नाग आम आदमी की तरह कैमरे के सामने आए। बस किरदार बन गए। यही सहजता धीरे-धीरे पहचान बनी। अनंत नाग का हिंदी सिनेमा से परिचय श्याम बेनेगल की फिल्म ‘अंकुर’ से हुआ। यह उनकी पहली हिंदी फिल्म नहीं थी बल्कि उस नए सिनेमा की शुरुआत भी थी जो गांव, जमींदारी, गरीबी और समाज के दबे सच को पर्दे पर ला रहा था। अनंत नाग ने जमींदार के बिगड़ैल लड़के सूर्या का किरदार निभाया था। उनके साथ शबाना आजमी थीं। दोनों नए थे लेकिन ‘अंकुर’ ने जाना-पहचाना चेहरा बना दिया। इसके बाद श्याम बेनेगल की ‘निशांत’, ‘मंथन’, ‘भूमिका’, ‘कोंडुरा’ और ‘कलयुग’ जैसी फिल्मों में अनंत नाग अलग-अलग किरदारों में दिखाई दिए। ‘निशांत’ में सामंती ताकत और गांव की बेबसी की कहानी थी तो ‘मंथन’ ने किसानों और दूध की सहकारी क्रांति को पर्दे पर उतारा। इन फिल्मों में न चमकदार सेट थे और न नायक को महान दिखाने की कोशिश। यहां कहानी का असली चेहरा आम आदमी था और अनंत नाग उसी दुनिया के कलाकार बन गए। उन्होंने कन्नड़ सिनेमा में प्रेम कहानी, पारिवारिक फिल्म, हास्य और आम मनोरंजन वाले किरदार भी उतनी ही आसानी से निभाए। दूरदर्शन के मालगुडी डेज’ ने अनंत नाग को घरों तक पहुंचाया। आरके नारायण की कहानियों पर बने इस धारावाहिक का निर्देशन उनके भाई शंकर नाग ने किया था। छोटे शहरों की गलियां, सामा

आवाज से आवाज मिली... और गूंज उठी

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आवाज से आवाज मिली... और गूंज उठी

पुणे में जब राहुल गांधी की गूंज हुई तो सारा वजन विश्वजीत कदम पर था, जो कांग्रेस विधायक और भारतीय विद्यापीठ के मालिक हैं। सैकड़ों-हजारों बच्चे पढ़ते हैं और कांग्रेसियों ने पूरा ताना-बाना इसी के इर्द-गिर्द बुन लिया था। पुणे एजुकेशन हब है। इसके बाद ही इंदौर का नाम आया। वैसे आया नहीं, लाया गया। जीतू पटवारी ने राहुल गांधी से कहा कि इंदौर में गूंज कर दीजिए। पुणे की कामयाबी से गद्गद् दिल्ली टीम के लिए इजाजत देना आसान नहीं था। कुछ जतन के बाद आखिरकार माने। मौका-मुआयना करने टीम को इंदौर भेज दिया, जिन्होंने अलग-अलग तरह से जांचा-परखा और नतीजा निकाला कि अगर पुणे के आसपास भी गूंज हो गई तो कामयाब मान लिया जाएगा। फिर पुणे तो राहुल की टीम गई थी और इंदौर बुलाई गई थी, इसलिए दबाव था कि खुद ही तराजू में आ गए थे। सबसे बड़ा मामला सरकार से निपटना था। तभी बारह सितंबर की तारीख फेंकी गई, जबकि उन्नीस पहले से लॉक थी। वैसे कांग्रेसी मुगालते भी इसमें ढूंढे जा सकते हैं कि दिल्ली यूनिवर्सिटी का नतीजा उन्नीस को आ रहा था और राहुल की टीम को लगा कि जीत का जश्न भी इंदौर में ही मना लेंगे। खैर, बारह के जरिए देखना चाहते थे कि सरकार कितनी बारह बजाती है। कुछ दिक्कतों के बाद रास्ता बनने लगा तो उन्नीस का ऐलान हो गया। चूंकि पटवारी ने खुद गूंज मांगी थी, इसलिए सब उनके माथे था और पहले दिन समझ आ गया था कि किसी के भरोसे नहीं रहा जा

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(बे)पटरी... पटवारी!

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(बे)पटरी... पटवारी!

यदि सरकारी जमीन पर कब्जे की रजिस्ट्री का हक पटवारी को ही मिल जाएगा तो बाकी अमले की जरूरत क्या है! पटवारी ने सही किया या गलत, यह कौन तय करेगा! यदि उसने गलत कर दिया तो क्या उसे गड़बड़ी का जिम्मेदार नहीं माना जाएगा? ये सवाल हैं, जो सरकार से पटवारी पूछ रहे हैं और मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि आप पर कोई आंच नहीं आएगी। जमीन की मिल्कियत आम बात नहीं है और यह तय करने का अधिकार पटवारी के जिम्मे वाजिब नहीं। पता नहीं, सरकार को क्या सूझा कि लाखों कब्जों और पट्टों की रजिस्ट्री की सनक सवार हो गई। सही-गलत की चिंता से दूर लाखों मामले रजिस्ट्री में तब्दील कर वोट की जुगाड़ तो हो सकती है, लेकिन कायदे का राज नहीं रह सकता। यदि ये कब्जे और पट्टे वाजिब होते तो मिल्कियत के लिए बचे नहीं रहते। वाजिब मामलों में सही फैसले रजिस्ट्री तक पहुंचते हैं और वह अफसर नहीं, मूल मालिक कराता है। प्रदेश के पटवारियों की चिंता सही है कि यह जिम्मेदारी बड़े अधिकारियों को लेनी चाहिए कि मिल्कियत वे तय करें। रजिस्ट्री भी एडीएम से नीचे करने का हक नहीं देना चाहिए। ऐसी धांधली कभी अर्जुनसिंह ने भी की थी कि जो जहां काबिज है, पट्टे दे दिये थे। इतनी सावधानी बरती थी कि रजिस्ट्री नहीं करवाई थी। मिल्कियत सरकार की ही रखी थी। केवल रहने का हक दिया था। यह सरकार तो मालिक बनाने पर तुल गई और भूल गई कि जो लोग सरकारी जमीन पर कब्जा नहीं कर वैध मकान बनाते

मेवा हो तो… (जन) सेवा होती है!

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मेवा हो तो… (जन) सेवा होती है!

यह समय जन-सेवा के पच्चीस वर्ष के उत्सव का है। ठीक ही है कि जनता तो नाशुक्री होती है कि कितनी भी सेवा कर लो, उसे भान ही नहीं रहता कि बेचारे को सेवा करते-करते कितने साल हो गये। बताइए, यदि सरकारी विज्ञापन और गोदी-मीडिया ना हो तो कौन मानने को तैयार होता कि ‘महामानव’ ने चौथाई सदी सेवा में गुजार दिए। यहां मुझे थोड़ी आपत्ति है, कि बाकी बावन साल कहां गये, यदि प्रधान-सेवक की उम्र 77 साल मान लें। यह तो सरासर नाइंसाफी है कि बाकी साल को यहां चाय पिलाने या घर से दूर भटकने के नाम पर जाया कर दें। कहते हैं, सेवा करो तो मेवा मिलता है, हो सकता है, यह सिद्धांत आम जनता के लिए हो और अवतारी के लिए नियम-कायदे अलग हों। हम तो यही सुनते आए कि सेवा करने से मेवा मिलता है, लेकिन यहां तो मेवा के इंतजार में जनसेवा पूरे बावन साल स्थगित रही। अर्थात् अब से यदि जन को सेवा करवाना है, तो पहले मेवा यानी सत्त‍ा देना होगी। यह तो गलत बात है कि सरकार में आने के बाद ही सेवा-वर्ष की गिनती हो। इसका तो यह मतलब भी हुआ कि जब तक आप सत्ता में नहीं हैं, जनसेवा का कोई अधिकार ही नहीं है। चने- भुंगड़े खाकर जो प्रचार कर रहे थे, दरअसल जनसेवा नहीं कर रहे थे, क्योंकि जब तक सत्ता नहीं है, तो जनसेवा का क्या मतलब! ‘भूखे भजन ना होई’, जैसा ही मामला है क्या! पार्टी को जन-सेवा के आंकड़े देते हुए इस बात पर तो माथापच्ची करना ही थी कि बाकी उम्र क्य

चढ़ता सूरज धीरे-धीरे ढल गया!

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चढ़ता सूरज धीरे-धीरे ढल गया!

चटर्जी नाइट मशहूर ऑर्केस्ट्रा था, जिसकी तारीख मुश्किल से मिलती थी। भारी भीड़ उमड़ती थी। चटर्जी नाइट के प्रभात चटर्जी सितारा थे। बड़े-बड़े बाल और ऊंची कद-काठी थी। इमली बाजार चौराहे पर गणेश उत्सव होते थे। हमने चटर्जी नाइट के लिए चंदा किया, क्योंकि बजट बड़ा होता था। कई दिन पहले चटर्जी ब्रदर्स के शो की तारीख लेने गए थे। इंतजार के बाद प्रभात के छोटे भाई मनोज बाहर आए। एक दिन की रजामंदी मिली। शर्तें बताई गईं और सभी माननी पड़ीं। हमने कहा कि प्रभात से मिलवा दीजिए। मनोज बोले रिहर्सल चल रही है। पहले बुकिंग फाइनल कीजिए और एडवांस जमा करवाइए। अगर शो फाइनल होता है, उसके बाद ही दादा मिलेंगे। इंदौर में ऐसा कोई कलाकार हुआ है, जिससे बिना एडवांस इजाजत नहीं थी ! कोई चारा नहीं था, इसलिए फौरन एडवांस दिया, एग्रीमेंट साइन हुआ और प्रभात चटर्जी बाहर आए। सिर्फ दो मिनट बात की और चले गए। हम खुश थे कि प्रभात चटर्जी को करीब से देखने का मौका मिला। अब अलग ही जोश था और चटर्जी नाइट का ऐलान कर दिया। गणेश उत्सव शुरू हुआ और चटर्जी नाइट के शो का दिन आ गया। सारी तैयारियां पूरी थीं। शानदार स्टेज था और उस पर साजो-सामान भी। शो बस शुरू होने ही वाला था कि बारिश हो गई। पहले लगा कि कुछ देर में सब ठीक हो जाएगा, लेकिन रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। हमारी पूरी टीम बेचैन, बेबस और परेशान थी। कुछ की आंखों से बारिश शुरू कर दी। शो कैंस

'अच्छी नीयत का शब्द... साहित्य है!'

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'अच्छी नीयत का शब्द... साहित्य है!'

अब महिलाएं भी उपभोक्ता बन गई हैं और सामग्री पुरुष हैं। लस्ट स्टोरीज-3 (नेटफ्लिक्स) की कहानियों में इच्छा को असलियत के आईने में उलझी तस्वीर की तरह दिखाया है। चार कहानियों और चार निर्देशकों का कमाल है! मंटो के अफ़सानों से जोड़कर कहा गया कि यदि अच्छी नीयत से लिखा जाए, तो हर शब्द साहित्य हो जाता है। यही महीन रेखा है, जिस पर निर्माता-निर्देशक खुद को भी आज़मा रहे हैं। महिलाओं की इच्छाएँ, सुख और सेक्स जैसे विषय इसमें खुलकर सामने आते हैं। महिलाओं की दुनिया में इच्छाओं का चरम पर होना इसकी थीम है। विक्रमादित्य मोटवाने, किरण राव, शकुन बत्रा और विशाल भारद्वाज का निर्देशन है। ये चार कहानियां हैं। शुरुआत ‘4 दिन पहले’, ‘4 महीने पहले’, ‘4 दशक पहले’ जैसे शीर्षकों से होती है। ‘लस्ट’ (हवस) को विक्रमादित्य मोटवाने मध्यमवर्गीय सोच के रूप में रखते हैं, किरण राव उसे हथियार के रूप में, शकुन बत्रा दवा के रूप में और विशाल भारद्वाज भाषा के तौर पर दिखाते हैं। हर कहानी प्यार और काम-इच्छा के बीच के कमज़ोर पुल को टटोलती है। दो सहेलियाँ कोरियन ड्रामा देखते हुए दुनिया के बदलावों को अपनाना चाहती हैं, लेकिन वे मुम्बई में रहती हैं। भारत के किसी भी इलाके में रहतीं, तब भी कंडीशनिंग आड़े आ ही जाती। ‘तथाकथित पाप को प्लेज़र की तरह जी रही हैं। प्यार है या वासना, लव चाहिए या लस्ट, इस उलझन में हैं। प्यार में वासना भी होती है

सियासत में विजयवर्गीय का ‘ज्यादा बोलना’ बना परेशानी का सबब

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सियासत में विजयवर्गीय का ‘ज्यादा बोलना’ बना परेशानी का सबब

मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को जानने वाले मानते हैं कि वे भले बदजुबान हों… महिलाओं के लिए गलत नहीं बोलते हैं! कभी उन्हें बातचीत में भी महिलाओं के लिये गलत बोलते नहीं सुना गया। ऐसे भाजपाई हैं, जिनसे महिलाएं बड़़ी तादाद में सबसे पहले जुड़ीं। आशा विजयवर्गीय का योगदान ज्यादा रहा, महिलाओं के दम पर अजेय रहे। महिलाओं के कारण ही विपरीत हालात में भी राजनीति बेअसर रही। जितनी सीट से उन्होंने जीतने का रिकार्ड बनाया है, बगैर महिला वोटरों के संभव नहीं था। पार्षद संध्या यादव के बारे में बोलते समय भी भाव गलत रहा होगा, यह विरोधी भी नहीं मान सकते। दरअसल, विजयवर्गीय ज्यादा और फालतू बोलने से संकट में आते हैं। उन्हें कम और नपा-तुला बोलना चाहिए। यदि ऐसा करते तो प्रदेश के मुखिया हो जाते। जिस तरह महेश जोशी और सुरेश सेठ अनर्गल बोलकर खर्च हुए, वैसे ही भाजपा में विजयवर्गीय हैं। सुमित्रा महाजन से सीखना चाहिए कि किस तरह खामोशी से काम किए जाते हैं। यदि दिग्विजयसिंह फिजूल बकवास नहीं करते, तो किनारे होते? कुछ दिन विजयवर्गीय को खामोश रहना चाहिए। विरोधियों को खुलेआम निपटाने की आदत ने उन्हें ही निपटा दिया।

‘बॉयफ्रेंड से शादी जरूरी नहीं’

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‘बॉयफ्रेंड से शादी जरूरी नहीं’

मौसमी चटर्जी ने कहा कि बॉयफ्रेंड होने का मतलब उसी से शादी करना नहीं है। लड़की मेघा से कहती हूं कि तुम्हारा बॉयफ्रेंड हो सकता है लेकिन उसी से शादी करना जरूरी नहीं।” मौसमी ने कहा कि समय बदल चुका है इसलिए लड़कियों को सोचना चाहिए। परिवार ससुराल संभालना सिखाते हैं, लेकिन लड़कों को घर की जिम्मेदारी नहीं सिखाते। दूसरों को कुछ साबित करने के लिए कोई फैसला न लें और गलतियों से सीखें। मौसमी की शादी बाली-उमर में संगीतकार हेमंत कुमार के लड़के जयंत मुखर्जी से हुई!

जो बोलना है बोलो'... स्वरा भास्कर

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जो बोलना है बोलो'... स्वरा भास्कर

मैंने ऐसा क्या कह दिया, बात का बतंगड़ बनाया जा रहा है, स्वरा भास्कर ने कहा,’ मैंने ऐसा बिल्कुल नहीं कहा कि रानी पद्मावती कायर थीं या महल की बाकी औरतें कायर थीं। क्लाइमेक्स देखकर कहा था, अगर मैं होती तो कायर महसूस करती कि मैंने जान क्यों नहीं दी, कि बलात्कार के बाद जिंदा बच गई तो मैं कायर हूं।’ फिल्म पद्मावत (2018) के आखरी सीन पर स्वरा ने पहले भी बात की थी। सहलेखक प्रकाश कपाडि़या ने बताया, ’’हमने खोज कर इतिहास में लिखा ही दिखाया है, हर इंसान खुद के हिसाब से सोचता है। जौहर वाला दृश्य उस वक्त की सच्चाई है जो बदला नहीं जा सकता। उस वक्त के हालात यही थे, इसलिए केसरिया पहना था। राजपूतों में केसरिया रंग जब पहना जाता था कि अब जंग में जीत हासिल नहीं हो तो आखिर मरते दम तक लड़ते रहो। कपाडि़या कहते हैं, स्वरा की बात तो नहीं जानता, लेकिन इस बात पर जो हल्ला हो रहा है, उसका जवाब दे रहा हूं। यह तो देखने वाले की सोच पर है कि किस नजरिए से फिल्म देख रहा है। गलत बताने के लिए इरादतन बुरा कहने के लिए और विवाद पैदा करने के हिसाब से।

सितंबर में फिर बढ़ा इंदौर का तापमान, 33.1°C पहुंचा पारा

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सितंबर में फिर बढ़ा इंदौर का तापमान, 33.1°C पहुंचा पारा

इंदौर में सितंबर का मौसम एक बार फिर गर्म महसूस किया जा रहा है। मंगलवार को शहर का अधिकतम तापमान 33.1 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो इस महीने का अब तक का सबसे अधिक तापमान बताया गया है। मौसम विभाग के अनुसार पश्चिमी मध्य प्रदेश में हल्की बारिश की संभावना बनी हुई है, जबकि कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश की संभावना भी जताई गई है। मौसम में बदलाव के बीच शहर में गर्मी और उमस दोनों का असर महसूस किया जा रहा है।

उद्भव ओझा बोले- ऐसा भारत कभी नहीं देखा

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उद्भव ओझा बोले- ऐसा भारत कभी नहीं देखा

अच्छा ही है कि और बुरे दिन देखने के लिये हम जिंदा नहीं रहेंगे… लेकिन आज की पीढ़ी के लिये चिंता हो रही है कि वोट की राजनीति के लिये किस कदर एक-दूसरे के लिये नफरत भरी जा रही है। एक फिल्म निर्माता ने उस गायक को काम नहीं दिया, जो मुस्लिम था। पढ़े-लिखे समझदार और ऊंचे पद पर बैठे भी डरे हुए हैं, सरकार के बहकावे में। हमने ऐसा भारत कभी नहीं देखा। हमारे जावरा (म.प्र.) में उस समय भी कुछ नहीं हुआ, जब बाबरी मस्जिद गिराई थी।

ब्लैक में खरीदी थी ’लूना’!

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ब्लैक में खरीदी थी ’लूना’!

सत्यनारायण पटेल के पास दो हेलिकॉप्टर, पंद्रह घोड़े और पांच बंदूकें हैं, लेकिन पूर्वजों की जितनी जमीन थी, अब कम हो गई है। पायलट हैं, घोड़े दौड़ाना जानते हैं, समंदर में गोते लगा चुके हैं और राइफल क्लब के मेंबर रहे हैं। इंदिरा गांधी को देखने ट्रक के बोनट पर बैठकर चले गए थे! पहले कहां से-गुजरात. कौन आया-पता नहीं. दादा-पहले ही चले गए. मां-गीता पटेल. कहां से-गौतमपुरा के पास भीलवाड़ा. पुरखों की जमीन-दादा के पास तो दो हजार एकड़ होगी. पिता की- कम होती चली गई. क्यों-सियासत. काम संभाला तब-आठ सौ एकड़ होगी. अभी कितनी-पांच-छह सौ एकड़. आपकी-परिवार की. स्कूल -गांव का सरकारी. कैसा था-टाटपट्टी पर बैठते थे. दादागीरी होगी-क्यों. पिता नेता थे-अरे नहीं, डर था. किसका-बाबूजी को पता चलेगा तो पिटाई होगी. कोई और स्कूल-ब्राइट, एसजीएचएस और बाल विनय मंदिर. शिक्षक याद हैं-श्याम राव जोशी. क्या खास-पिताजी को पढ़ाया और मुझे भी. बचपन के खेल-कबड्डी, गुल्ली-डंडा, सितोलिया. झाड़ पर चढ़े-कोई नहीं छोड़ा. पतंग- लूटी भी. तैरना-अच्छा. कहां सीखा-कुएं में. नदी-मौका नहीं लगा. समंदर-गोते लगाए हैं. गांव के दोस्त-बहुत हैं. मिलना-कम, पर मिलते हैं. गांव के खेल-कबड्डी, वॉलीबॉल, फुटबॉल. बनेठी घुमाई-खूब. मां कैसी थीं-कड़क थीं. कैसे-बाबूजी बाहर रहते थे, घर उन्होंने ही संभाला. पिटाई-हुई तो. मां का खाना-लहसुन का साग और बाटी. और कुछ-भुट्ट

नेता पीछे, युवा आगे

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नेता पीछे, युवा आगे

कांग्रेसी विधायक भंवरसिंह शेखावत की जड़ें भाजपाई हैं। वहां बड़े नेताओं के साथ ठंसना मना है। जिसे इजाजत हो, वही पास फटकता है। कांग्रेसी माथा-फोड़ी कर रहे थे कि इतने नेता राहुल गांधी के साथ कैसे आएं। कौन, कहां खड़ा रहे या बैठाया जाए। मुखिया जीतू पटवारी ने शेखावत से कहा कि आप भी कुछ बताएं कि कैसे, क्या हो। शेखावत ने कहा कि हम लोगों को मंच पर बैठने से बचना चाहिए। यह अलग मिजाज का मजमा है, इसलिए हम इससे दूर रहें। चारों तरफ केवल युवा नजर आएं। हम को तो पांडाल के बाहर रहना चाहिए। पसंद आया कि ऐसा ही हो। वे चेहरे निराश हुए जो ठंसने की तैयारी में थे।

पिटाई पर भिया की ‘सफाई…’!

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पिटाई पर भिया की ‘सफाई…’!

भिया की हरकतों पर सवाल यानी मुसीबत है। कोई मदद नहीं कर पाए। सवाल के जवाब में जब मरम्मत हो जाती है, तो पुलिस भी भाव नहीं देती कि इसके लिए उकसाने का दोषी तो खुद सवाली है। न वो उकसाता और ना ये नौबत आती। आखिर भिया की इमेज का सवाल है कि कोई सवाल हो तो कैसे! भिया जवाब देते हैं, भला! यह काम तो पट्ठों के जिम्मे है, जिसे सही ढंग से अंजाम देते हैं। इस पर भी भिया से सवाल हुआ कि पट्ठों ने सवाली को ऐसा जवाब क्यों दिया, तो भिया की सफाई सामने आई। भिया की मासूम सूरत पर सवाल था कि क्या ऐसा कुछ हुआ, मुझे तो पता ही नहीं! यदि हुआ तो गलत है और सवाली को इस हरकत के खिलाफ पुलिस में जाना चाहिए। जिन अज्ञात लोगों ने यह हरकत की है, पुलिस को चाहिए कि उन्हें नहीं बख्शे। यदि मदद चाहिए तो मैं तैयार हूं। चाहे तो थाने जा सकता हूं, उसकी रपट दर्ज करवाने। भिया ने और सफाई दी कि ऐसी हरकत करने वाले उनके लोग नहीं हो सकते। शायद कहना चाहते हों कि मेरे पट्ठे ऐसा करने से पहले पूरी सावधानी बरतते हैं कि हमारा नाम न आए। भिया कहते हैं कि यह उनके खिलाफ साजिश हो सकती है कि जिसने सवाल करने भेजा, उसी ने जवाब देने वाले भी भेज दिये ताकि मैं बदनाम हो जाऊं। उधर सवाली से पुलिस सवाल कर रही थी कि तुम किसके इशारे पर सवाल कर रहे हो और शहर की शांति भंग कर रहे हो! तुम्हारी बहुत शिकायतें आ रही हैं कि सबको परेशान कर रखा है। अब यदि शिकायत आई…तो सि

‘तस्वीर ने रुख ही बदल दिया’

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‘तस्वीर ने रुख ही बदल दिया’

मंदाकिनी ने दाऊद इब्राहिम के साथ पुरानी तस्वीर पर कहा कि वह न तो दाऊद की मेहमान थीं और न बुलावे पर क्रिकेट मैच देखने पहुंची थीं। कार्यक्रम के सिलसिले में दुबई गई थीं और बाद में मैच देखने चली गईं जहां दाऊद भी बैठा था। मंदाकिनी का कहना है उन्हें अंदाजा नहीं था कि वहां की तस्वीर उनकी पूरी जिंदगी पर भारी पड़ जाएगी। दाऊद से उनके रिश्ते की बातें शुरू हुईं। फिर शादी और बच्चा होने तक की बातें बना दी गईं। उन्होंने कहा कि इस विवाद ने फिल्मी करियर को बहुत नुकसान पहुंचाया। सफाई देती रहीं लेकिन उनकी बात से ज्यादा अफवाहों को जगह मिली। उस समय बात संभालने के लिये टीम भी नहीं होती थी इसलिए तस्वीर की कहानी फैलती गई। मंदाकिनी का दर्द यह है कि 75 से ज्यादा फिल्मों में काम करने के बावजूद उनकी पहचान बार-बार उसी तस्वीर तक कर दी गई। राज कपूर की फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ से मिली शोहरत के बाद जो नाम उन्होंने अपनी मेहनत से बनाया था उस पर अफवाह का साया पड़ गया।

चमक-दमक ने संघर्ष की आग धीमी कर दी...!

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चमक-दमक ने संघर्ष की आग धीमी कर दी...!

आजादी की कहानी हमें कई बार सुनाई गई लेकिन उसका बड़ा हिस्सा पीछे छूट गया। जिन नौजवानों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हथियार उठाए, बम बनाए, बगावत की तैयारी की और मौत के सामने खड़े हो गए, उनमें से कई इतिहास दफ्न हो चुके हैं। ‘द रिवोल्यूशनरीज़’ (प्राइम वीडियोज) उन्हीं भूले चेहरों को पर्दे पर लाती है लेकिन पर्दे की चमक संघर्ष की आग पर भारी पड़ जाती है। संजीव सान्याल की किताब ‘रिवोल्यूशनरीज़: द अदर स्टोरी ऑफ हाउ इंडिया वॉन इट्स फ्रीडम’ पर है। आठ एपिसोड हैं और करीब सात घंटे की है। कहानी 1912 के आसपास शुरू होती है, जब गांधी का अहिंसक आंदोलन ताकत नहीं बना था। रासबिहारी बोस, बाघा जतिन, सचिंद्रनाथ सान्याल और साथी मानते थे कि अंग्रेजों को निकालने के लिए हथियार भी चाहिए और फौज में बगावत भी। रासबिहारी बोस बने (भुवन बाम) धुरी हैं। कभी भेष बदलकर अंग्रेजों को चकमा देते हैं, कभी योजना बनाते हैं और कभी टूटते साथियों को संभालते हैं। भुवन ने अपनी छवि से बाहर निकलने की कोशिश की है लेकिन जहां किरदार को भारीपन और अंदर धधकती आग चाहिए, वहां उनकी सीमा दिखाई देने लगती हैं। रोहित सराफ ने सचिंद्रनाथ सान्याल के सफर को ठीक ढंग से किया है। शुरुआत में हिचकता नौजवान सब दांव पर लगाने वाला बनता है। प्रतिभा लाहिड़ी के किरदार में प्रतिभा रांटा ध्यान खींचती हैं। उनके चेहरे पर प्रेम, जिद, डर और विद्रोह साथ दिखाई देते हैं। म

‘धुरंधर’ ने पुराने गीतों का सत्यानाश किया:समीर

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‘धुरंधर’ ने पुराने गीतों का सत्यानाश किया:समीर

गीतकार समीर का कहना है कि ‘धुरंधर’ जैसी फिल्मों ने संगीत को बैकग्राउंड बना दिया है। इस फिल्म में, “पुराने गीतों का सत्यानाश कर दिया।” समीर ने कहा, गीत ‘जुम्मा चुम्मा दे दे’ को गोलीबारी वाले सीन के बीच इस्तेमाल किया है। जब पर्दे पर गोलियां चल रही हैं और पीछे ‘जुम्मा चुम्मा’ बज रहा है तो उस गाने की भावना आखिर कहां बचती है! समीर ने कहा कि पुराने गीतों को नए तरीके से पेश करना गलत नहीं है। गीत ‘दिलबर’ को दोबारा बनाया तो नई पीढ़ी तक पहुंचा लेकिन परेशानी तब शुरू होती है जब गीतकार को किनारे कर बेमेल शब्द लिखवा लिए जाते हैं। कई बार ऐसे शब्द जोड़ दिए जाते हैं, जिनका पुराने गीत से कोई रिश्ता ही नहीं होता। उन्होंने कहा कि पहले निर्माता और निर्देशक गाने पर घंटों बैठते थे। फिल्म की कहानी और सीन समझाने के बाद गीत लिखा जाता था। अब सीधे कहते हैं कि कोई हिट गाना हो तो दे दीजिए। जब फिल्म में दर्जनभर संगीतकार और उससे भी ज्यादा गीतकार होंगे तो संगीत में एक जैसी सोच और एहसास कैसे आएगा! समीर ने करण जौहर और आदित्य चोपड़ा के पर सवाल उठाए। इन बैनरों ने कभी अच्छे संगीत को आगे बढ़ाया था लेकिन अब उनका ध्यान भी गानों पर नहीं रहा। नई प्रतिभाओं को मौका मिलना चाहिए लेकिन पुराने और अनुभवी कलाकारों को बेकार मानकर बाहर कर देना फिल्म संगीत के लिए ठीक नहीं है।

आधा ही रह गया ‘दायरा’

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आधा ही रह गया ‘दायरा’

मेघना गुलजार की फिल्म ‘दायरा’ ऐसे वक्त में आई है, जब लोग अदालत के फैसले का इंतजार करने के बजाय मौके पर ही सजा देने को सही मानने लगे हैं। फिल्म इसी सोच पर सवाल उठाती है। दिखाती है कि जब पुलिस खुद कानून से ऊपर उठकर फैसला करने लगे, तो इंसाफ और बदले के बीच का फर्क कितना खतरनाक ढंग से मिट जाता है। फिल्म की कहानी 2019 के हैदराबाद मामले से प्रेरित है। एक नौजवान लड़की के साथ बेरहमी से ज्यादती होती है। इसके बाद एसीपी पृथ्वीराज, आरोपियों को मुठभेड़ के नाम पर मार देता है। जनता में खुशी के मारे पागल हो जाती है। लोगों को लगता है कि आखिरकार इंसाफ मिल गया। लेकिन मानवाधिकार आयोग इस मामले पर नजर डालता है और सरकार जांच बैठा देती है। जांच की जिम्मेदारी एसीपी करीना कपूर खान को दी जाती है। यहीं से फिल्म का असली सवाल सामने आता है… क्या इंसाफ मिलने में देर हो रही हो, तो पुलिस को खुद सजा देने का हक मिल जाता है? रमन का तरीका तेज है। वह अपराधियों को तुरंत खत्म कर देना चाहता है। दूसरी तरफ अजोनी कानून और तय नियमों के मुताबिक चलती है। एक तरफ गुस्सा है, दूसरी तरफ व्यवस्था पर भरोसा। मेघना गुलजार दोनों के नजरिए सामने रखती हैं और आपको आसानी से किसी एक खेमे में खड़ा नहीं करतीं। फिल्म की शुरुआत में व्यवस्था की कई कमियां सामने आती हैं। गरीब और कमजोर आरोपी पुलिस की सख्ती झेलते हैं, जबकि पैसे और रसूख वाले लोग जेल के अं