चमक-दमक ने संघर्ष की आग धीमी कर दी...!

· Indore

चमक-दमक ने संघर्ष की आग धीमी कर दी...!

आजादी की कहानी हमें कई बार सुनाई गई लेकिन उसका बड़ा हिस्सा पीछे छूट गया। जिन नौजवानों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हथियार उठाए, बम बनाए, बगावत की तैयारी की और मौत के सामने खड़े हो गए, उनमें से कई इतिहास दफ्न हो चुके हैं। ‘द रिवोल्यूशनरीज़’ (प्राइम वीडियोज) उन्हीं भूले चेहरों को पर्दे पर लाती है लेकिन पर्दे की चमक संघर्ष की आग पर भारी पड़ जाती है।

संजीव सान्याल की किताब ‘रिवोल्यूशनरीज़: द अदर स्टोरी ऑफ हाउ इंडिया वॉन इट्स फ्रीडम’ पर है। आठ एपिसोड हैं और करीब सात घंटे की है। कहानी 1912 के आसपास शुरू होती है, जब गांधी का अहिंसक आंदोलन ताकत नहीं बना था। रासबिहारी बोस, बाघा जतिन, सचिंद्रनाथ सान्याल और साथी मानते थे कि अंग्रेजों को निकालने के लिए हथियार भी चाहिए और फौज में बगावत भी।

रासबिहारी बोस बने (भुवन बाम) धुरी हैं। कभी भेष बदलकर अंग्रेजों को चकमा देते हैं, कभी योजना बनाते हैं और कभी टूटते साथियों को संभालते हैं। भुवन ने अपनी छवि से बाहर निकलने की कोशिश की है लेकिन जहां किरदार को भारीपन और अंदर धधकती आग चाहिए, वहां उनकी सीमा दिखाई देने लगती हैं।

रोहित सराफ ने सचिंद्रनाथ सान्याल के सफर को ठीक ढंग से किया है। शुरुआत में हिचकता नौजवान सब दांव पर लगाने वाला बनता है। प्रतिभा लाहिड़ी के किरदार में प्रतिभा रांटा ध्यान खींचती हैं। उनके चेहरे पर प्रेम, जिद, डर और विद्रोह साथ दिखाई देते हैं। मोहब्बत कहानी को इंसानी बनाती है लेकिन सचिंद्रनाथ और प्रतिभा की प्रेम कहानी कई जगह मूल रफ्तार रोक देती है।

गुरफतेह पीरज़ादा (बाघा जतिन) मजबूत मौजूदगी दर्ज कराते हैं लेकिन लेखन ने जगह नहीं दी। पाओली दाम छाप छोड़ती हैं। अंग्रेज अफसर डायर बने (जेसन शाह) क्रूरता पैदा करते हैं लेकिन उनका हकलाना और चेहरे की हरकतें नकली लगती हैं।

सीरीज़ की असल ताकत विषय है। दिल्ली, देहरादून, बनारस, कलकत्ता और लाहौर के बीच फैलती कहानी बताती है कि आजादी की लड़ाई कुछ बड़े नाम तक नहीं थी। इसके तार देश से बाहर तक फैले हुए थे।

पुरानी इमारतें, गलियां, कपड़े, रोशनी और पीछा करने वाले सीन बड़े पर्दे का एहसास देते हैं लेकिन यही खूबसूरती इसकी कमजोरी भी बन जाती है। क्रांतिकारी फरारी में भी जरूरत से ज्यादा सजे हुए दिखते हैं। संघर्ष की धूल, भूख, डर और थकान कम दिखाई देती है। तेज संगीत, धीमी चाल में चलते नायक और बार-बार आने वाले जोशीले संवाद कई जगह सच्ची लड़ाई को चमकदार तमाशा बना देते हैं। घटनाएं तो दिखाती है लेकिन किरदार के अंदर कम उतरती है। वे क्या सोचते थे, हिंसा को क्यों जरूरी मानते थे और आम भारतीय उन्हें किस नजर से देखते थे, इन सवालों का जवाब नहीं मिलता। मनोरंजन के लिए कल्पना गलत नहीं लेकिन असली लोगों की कहानी सुनाते समय चमक और सच के बीच दूरी साफ रखनी चाहिए।

‘द रिवोल्यूशनरीज़’ अधूरी लेकिन जरूरी कोशिश है। आखिरी सच्चाई समझ नहीं बल्कि इतिहास का बंद दरवाजा खोलने वाली चाबी समझकर देखिए। सीरीज़ हिला नहीं पाती, रासबिहारी बोस, बाघा जतिन और सचिंद्रनाथ सान्याल के बारे में और जानना चाहेंगे।