‘अंकुर’ से पनपा... वट-वृक्ष हो गया!

· Indore

‘अंकुर’ से पनपा... वट-वृक्ष हो गया!

जिस दौर में पर्दे पर ऊंची आवाज, भारी संवाद और मारधाड़ को अभिनय माना जाता था। अनंत नाग आम आदमी की तरह कैमरे के सामने आए। बस किरदार बन गए। यही सहजता धीरे-धीरे पहचान बनी।

अनंत नाग का हिंदी सिनेमा से परिचय श्याम बेनेगल की फिल्म ‘अंकुर’ से हुआ। यह उनकी पहली हिंदी फिल्म नहीं थी बल्कि उस नए सिनेमा की शुरुआत भी थी जो गांव, जमींदारी, गरीबी और समाज के दबे सच को पर्दे पर ला रहा था। अनंत नाग ने जमींदार के बिगड़ैल लड़के सूर्या का किरदार निभाया था। उनके साथ शबाना आजमी थीं। दोनों नए थे लेकिन ‘अंकुर’ ने जाना-पहचाना चेहरा बना दिया।

इसके बाद श्याम बेनेगल की ‘निशांत’, ‘मंथन’, ‘भूमिका’, ‘कोंडुरा’ और ‘कलयुग’ जैसी फिल्मों में अनंत नाग अलग-अलग किरदारों में दिखाई दिए। ‘निशांत’ में सामंती ताकत और गांव की बेबसी की कहानी थी तो ‘मंथन’ ने किसानों और दूध की सहकारी क्रांति को पर्दे पर उतारा। इन फिल्मों में न चमकदार सेट थे और न नायक को महान दिखाने की कोशिश। यहां कहानी का असली चेहरा आम आदमी था और अनंत नाग उसी दुनिया के कलाकार बन गए।

उन्होंने कन्नड़ सिनेमा में प्रेम कहानी, पारिवारिक फिल्म, हास्य और आम मनोरंजन वाले किरदार भी उतनी ही आसानी से निभाए। दूरदर्शन के मालगुडी डेज’ ने अनंत नाग को घरों तक पहुंचाया। आरके नारायण की कहानियों पर बने इस धारावाहिक का निर्देशन उनके भाई शंकर नाग ने किया था। छोटे शहरों की गलियां, सामान्य लोग और उनकी छोटी-बड़ी परेशानियां अनंत नाग की अभिनय शैली के बिल्कुल करीब थीं। नई पीढ़ी ने उन्हें ‘केजीएफ’ में लेखक आनंद इंगलागी के किरदार से पहचाना।

अनंत नाग ने 300 से ज्यादा फिल्में की। हिंदी, तेलुगु, तमिल, मलयालम और मराठी सिनेमा में भी छाप छोड़ी। उन्हें पांच फिल्मफेयर पुरस्कार और पांच बार कर्नाटक राज्य का सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार मिल चुका है। कर्नाटक विधान परिषद और विधानसभा के सदस्य बने और बेंगलुरु विकास मंत्री की जिम्मेदारी संभाली। उनकी असली पहचान हमेशा अभिनय ही रहा। राजकुमार के बाद वह दादासाहेब फाल्के पुरस्कार पाने वाले दूसरे कन्नड़ कलाकार हैं।

जिस कलाकार ने ‘अंकुर’ में अपनी जमीन तैयार की, ‘निशांत’ और ‘मंथन’ से उसे सींचा, ‘मालगुडी डेज’ से हर घर तक पहुंचाया और ‘केजीएफ’ तक नई पीढ़ी से जुड़ा रहा उसका यह सफर सचमुच अनंत है।