'अच्छी नीयत का शब्द... साहित्य है!'

अब महिलाएं भी उपभोक्ता बन गई हैं और सामग्री पुरुष हैं। लस्ट स्टोरीज-3 (नेटफ्लिक्स) की कहानियों में इच्छा को असलियत के आईने में उलझी तस्वीर की तरह दिखाया है। चार कहानियों और चार निर्देशकों का कमाल है! मंटो के अफ़सानों से जोड़कर कहा गया कि यदि अच्छी नीयत से लिखा जाए, तो हर शब्द साहित्य हो जाता है। यही महीन रेखा है, जिस पर निर्माता-निर्देशक खुद को भी आज़मा रहे हैं।
महिलाओं की इच्छाएँ, सुख और सेक्स जैसे विषय इसमें खुलकर सामने आते हैं। महिलाओं की दुनिया में इच्छाओं का चरम पर होना इसकी थीम है। विक्रमादित्य मोटवाने, किरण राव, शकुन बत्रा और विशाल भारद्वाज का निर्देशन है। ये चार कहानियां हैं। शुरुआत ‘4 दिन पहले’, ‘4 महीने पहले’, ‘4 दशक पहले’ जैसे शीर्षकों से होती है। ‘लस्ट’ (हवस) को विक्रमादित्य मोटवाने मध्यमवर्गीय सोच के रूप में रखते हैं, किरण राव उसे हथियार के रूप में, शकुन बत्रा दवा के रूप में और विशाल भारद्वाज भाषा के तौर पर दिखाते हैं। हर कहानी प्यार और काम-इच्छा के बीच के कमज़ोर पुल को टटोलती है।
दो सहेलियाँ कोरियन ड्रामा देखते हुए दुनिया के बदलावों को अपनाना चाहती हैं, लेकिन वे मुम्बई में रहती हैं। भारत के किसी भी इलाके में रहतीं, तब भी कंडीशनिंग आड़े आ ही जाती। ‘तथाकथित पाप को प्लेज़र की तरह जी रही हैं। प्यार है या वासना, लव चाहिए या लस्ट, इस उलझन में हैं। प्यार में वासना भी होती है और कई बार वासना होने का मतलब प्यार होगा ही, यह भी ज़रूरी नहीं होता। कामांध हैं, लेकिन लाचारी की तरह नहीं, बल्कि जरूरी मान रही हैं।
मोटवाने की कहानी पॉप कल्चर को मिडिल क्लास की इच्छा और आत्मसम्मान से जोड़ती है। रूढ़िवादी पद्मा (राधिका आप्टे) और एडवेंचरस शोनाली (कोंकणा सेन शर्मा) खोखली शादियों में जी रही हैं। घिसे-पिटे कोरियन ड्रामा से शोनाली को साहसी आइडिया आता है, वीकेंड ट्रिप पर पतियों की अदला-बदली करने का। इस कहानी में डर और जलन भी हैं। पटकथा उथली होने से कहानी सिर्फ़ चौंकाती है। यौन-संबंधहीन शादियों की मानवीय हताशा में छिपे बेतुकेपन को मोटवाने उजागर करते हैं।
कोंकणा और राधिका चुपचाप खोती जा रही महिलाओं के किरदारों में बढि़या अभिनय करती हैं। यह एहसास हो जाने पर भी कि घरेलू एकांत में कसमसाता विरोध किस तरह विद्रोह की ओर जा रहा है, उनका अभिनय बाँधे रखता है। विजय वर्मा और अभिषेक बनर्जी ने मोबाइल और अपनी बॉडी (एब्स) को लेकर जुनूनी पतियों का किरदार इतनी सहजता और आम ज़िंदगी वाले अंदाज़ में निभाया है कि राधिका और कोंकणा को निराशा ज़ाहिर करने का मज़बूत आधार दे जाते हैं। इसमें आम ज़िंदगी की कशमकश है, कि पार्टनर से प्यार तो करते हैं, लेकिन उनके साथ रहते अंदर ही अंदर घुटते भी रहते हैं।
शकुन बत्रा की कहानी तलाक के कगार पर पहुँचे जोड़े वरुण आप्टे (अली फ़ज़ल) और सायली वैद्य (राधिका मदान) की है। अली फ़ज़ल ने ऐसे पति की थकान को बखूबी दिखाया है, जिसे लगता है कि पार्टनर जादू की उम्मीदें रखता है। राधिका अपने पति के कॉर्पोरेट-स्टाइल वाले इमोशनल मैनेजमेंट से परेशान पत्नी के किरदार में हैं। उनके उलझे रिश्ते में नज़दीकी ही सुकून के दो पल लाती है। शकुन जटिल हो चुके प्यार और शादी के रिश्ते की गुत्थी सुलझाने की कोशिश में बातचीत और थेरेपी पर ज़ोर देते हैं। इमोशनल अनबन को ठीक करने के लिए ‘ब्रेक-अप सेक्स’ के चक्र में फँसे रहते हैं। वासना सुलह कराती है। थेरेपिस्ट से कहती है कि सेक्स से उथल-पुथल शांत हो जाती है। थेरेपिस्ट सीधे पूछता है, “वासना दर्द कम करने वाली दवा (पेनकिलर) है या इलाज?”
अली और राधिका ने युगल के तौर पर जुनून और गुस्से को साफ़ दिखाया है। उनके इमोशनल सीन और उनका उबलता हुआ गुस्सा गहराई से महसूस होता है। उनके बीच वासना भावुकता की सुरक्षा की चादर है। उनके चेहरों पर नाराज़गी और दबा दर्द दिखता है। वरुण की घायल नज़र और सायली का गुस्से से घूरना ही काफ़ी है। सायली को वरुण की माँ का कंट्रोल और वरुण का ‘अच्छा इंसान’ बनने का दिखावा पसंद नहीं है, जबकि वरुण सायली के ट्रॉमा और पैसिव-एग्रेसन (छिपे हुए गुस्से) को नहीं संभाल पाता। कहानी की लय और जगह का एहसास, पल भर में खोया और पाया प्यार, तीखी बातचीत का संगीत जैसा अंदाज़ और छोटी-छोटी बातों पर होने वाली चिड़चिड़ाहट को दिखाने में निर्देशकीय कमाल है। साइको-सेक्सुअल टेंशन को फ़िल्माना बहुत मुश्किल काम है। उनकी आख़िरी कोशिश वाली केमिस्ट्री उन यादों को फिर से देखने का ज़रिया बन जाती है, जो उन्हें लगता था कि उनके पास थीं। इन सभी फ़िल्मों में से यही एक पूरी तरह ठोस ड्रामा है; बाकी तीन तो चुलबुली रोमांटिक कॉमेडी हैं।
विशाल भारद्वाज काव्यात्मक अंदाज़ में निर्देशित करते हैं। यह कहानी वासना का अलग पहलू दिखाती है। इसमें पुरुष-प्रधान स्वभाव की बात है। हैदराबाद की गलियों में ले जाते हैं। यहाँ मंटो पढ़ती-पढ़ाती सायरा (अदिति) हकीम शौहर डॉक्टर बदरू (सिद्धार्थ) से आज़िज़ आकर कल्पनाओं के रंगीन सपनों में ऐसी खोती है कि सेक्स नॉवेल की लेखक चुलबुली बेगम बन जाती है।
पढ़ाई और कल्पना का इस्तेमाल कर सपनों का हीरो बुन लेती है, ऐसा अनोखा भारतीय मर्द, जो औरत की ज़रूरतों को समझे। वैसे उनकी शादी ठीक-ठाक है। लेकिन महिलाओं की इच्छाओं के बारे में लोगों की अज्ञानता पर सायरा अफ़सोस जताती है। सायरा का डॉक्टर पति अंतरंगता को क्लिनिकल प्रक्रिया की तरह देखता है।
विशाल भारद्वाज इस कहानी को कई रंगों से सजाते हैं। हर फ़्रेम कविता और सपनों की दुनिया जैसा है। अदिति शरारतों और कल्पनाओं में छिपी इच्छाओं को दिखाते हुए आकर्षक हैं। यह कहानी औरत की इच्छाओं की उस अनजानी दुनिया के बारे में है, जो शायद सिर्फ़ किताबों के पन्नों में ही पूरी हो पाती है। सायरा अपनी इच्छाओं के बारे में बात करने से हिचकिचाती है। वह इशारों में शौहर से बात कहती है, लेकिन बदरू को इंटिमेसी का हुनर सीखने की ज़रूरत है। सिद्धार्थ अपने किरदार को ख़ास स्टाइल में पेश करते हैं।
किरण राव की कहानी में डिलिवरी बॉय करण (गुरफतेह पीरज़ादा) और नेल आर्टिस्ट लीसा (सना थम्पी) हैं। जहाँ इच्छा जगह और जीने की जद्दोजहद है। रोमांचक जुड़ाव से शुरू कहानी तेज़ी से बदल जाती है, जब शीशे के पीछे की अलमारी से अचानक बहुत सारा पैसा गिरता है। पैसे का इस तरह अचानक आना, रोमांस के जुनून को खत्म कर देता है और उनके रिश्ते को केवल लेन-देन के सौदे में बदल देता है।