अंधेरे के उस पार देखने का वक्त!

कुछ छूट जाने के डर हैं, वरना मोदी भी संघ की तर्ज पर चलते। संघ के सौ बरस होने पर मोहन भागवत ने कहा था- इसमें ढिंढोरा पीटने या ताकत दिखाने जैसी कोई बात नहीं है। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने भी कहा था- मैं जन्मदिन नहीं मनाता, न किसी से मिलता हूं, न फोन पर बात करता हूं, लेकिन अब यह सब हो रहा है। जंतर-मंतर के काले मंतर ने खेल की बिछात उलट-पलट दी है। अब ये भी चौंकाने वाला है कि दीया जलाओ, पच्चीस बरस की सेवा का जश्न मनाओ... आइडिया कौन दे रहा है!
भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने तेज-तर्राट युवा नेताओं से लंबी बात की थी, जिसमें बूढे नेता अश्विनी वैष्णव थे, जो मौजूद चालीस नेताओं की मदद से नोट्स बना रहे थे, जिसका मकसद मोदी को यह बताना है कि किस तरह जेन-जी के साथ पटरी बैठ सकती है। तिलचट्टों की बात उसमें नहीं थी, लेकिन काम उनसे निपटने की तैयारी का ही था। माना जा रहा है कि यह आशीर्वाद का दीया उस बातचीत का ही फलसफा रहा, ताकि ऐसा इवेंट तैयार हो, जो पूरे सोशल मीड़िया मे छा जाए- दीये लगाते सेलिब्रिटी, आम लोग इंस्टा, ट्विटर पर टूट पड़ें।
पूरा दावं इस मायने में फेल हो गया कि यह सिर्फ भाजपा का इवेंट हो गया। लोगों ने बाढ़ के बाद कीचड़ से सनी बस्तियों, खस्ताहाल स्कूलों, बदहाल अस्पतालों, बालाघाट में खसरे, मलेरिया से मौत में समाए बैगा आदिवासी बच्चों, जहरीली शराब से मातम में पसरे इलाकों को याद कर करके दीये जलाए। ‘बीबीसी’ उस वक्त हैरान रह गया, जब उसने ऑनलाइन पूछा कि क्या मोदी को जन्मदिन पर तोहफा देना चाहते हैं? तोहफे के नाम पर जो तमाशा खड़ा किया कि उसे नसीहत देनी पड़ी- अपनी भाषा पर ध्यान दे। इससे भी बात नहीं बनी तो उसने डिब्बा आखिर बंद कर दिया।
इस पूरे बखेड़े में हासिल जरूर रहा, वह थी कुंदनलाल सहगल की गूंजती जादुई आवाज- दीया जलाओ, दीया जलाओ, जगमग-जगमग दीया जलाओ। अस्सी बरस पुरानी फिल्म ‘तानसेन’ का यह गाना राग दीप के सुर और गिटार पर गाते बदहाल स्कूलों के गलियारों में मजे करते जेन-जी। हालात कैसे भी हों, भरपूर मजे गहरे हास्य में डुबो देना कोई इनसे सीखे।
भाजपा शासित तमाम राज्यों के मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री, चंद्रबाबू नायडू तक... इस चक्कर में कि कहीं मोदी दरबार में जगह छूट न जाए, लगे हुए हैं। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साईं ने तो कमाल ही कर दिया। दीया जलाओ मुख्यमंत्री प्रतियोगिता में बाजी मार ली। सीधे विश्व रेकार्ड पर कब्जा जमा लिया। पटना के मरीन ड्राइव पर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने ऐसे दीये जलाए कि बाद में बच्चे उन दीयो से तेल निकालने में दौड़-दौड़ कर पसीना बहाते रहे। यह पटना के असली दीए हैं, जिनके पास रोशनी के लिए तेल नहीं है। सरकारी मशीनरी काम पर लग गई। अफसर दीए की तेल-बाती ठीक करने में लग गए।
ऐसे इवेंट और अभियान में ताकत खपाने वाली भाजपा अब गुजरात में तो ढाई दशक पूरे कर रही है। यह जनता के आशीर्वाद के दीए ही तो हैं, जो जल रहे हैं। अब दीयों को जलाने का नहीं, उसके पार फैले अंधेरे को देखने का वक्त है। स्कूलों की बदहाली, परीक्षा के घोटाले, नौकरियों का नियुक्ति घोटाला, बेरोजगारी बड़े चुनावी मुद्दे बनते दिखाई दे रहे हैं। देश के युवाओं ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा ले लिया है, यह कोई मामूली बात नहीं है, जहां विपक्ष और मीडिया के दबाव में मनमोहनसिंह की सरकार में इस्तीफे हुए। यह जागे जेन-जी हैं, जिन्होंने देश की राजनीति की धारा को बदल लिया। उस डर को डरा दिया, जो तेरह बरस से फूला सभी तरफ घूम रहा था।
भाजपा ने माहौल को पकड़ने की गाड़ी चुका दी है। इतना ही नहीं, वह गलत सवारी भी कर रही है, वरना दीया जलाने, मोबाइक रैलियां निकालकर ढिंढोरा पीट रहे तमाम मुख्यमंत्री बदहाल सरकारी स्कूलों की बात करते। पंचायत से लेकर पार्षद, विधायक, सांसदों तक ‘स्कूल ठीक करो अभियान’ की कोई घोषणा करते। जनप्रतिनिधि बन कर बैठे ये नेता जनता का पैसा कहां खर्च रहे हैं, इसका हिसाब पूछते-देते। जनता से यूपीआइ, सडकों की सफाई, मंदिरों में चंदे, कथा-भंडारों के नाम पर वसूली के बजाय स्कूलों और पढ़ाई को ठीक करने की बात करते। खास तौर पर उन आदिवासी इलाकों में, जहां स्कूल नदारद है। लंबे फासले की वजह से लड़कियां स्कूल छोड़ रही हैं, लड़के खेत पर काम करने के नाम पर दूर के स्कूल नहीं जा पा रहे हैं, स्कूल छोड़ने वालों की गिनती इसी वजह से बढ़ रही है, पर किसी भी मुख्यमंत्री के एजेंडे में यह मुद्दा नहीं रहा, न किसी ने यह करने की कोशिश की, क्योंकि पच्चीस बरस सेवा का जलसा आंखों के आगे चमकीली तस्वीर भरने का था। जमीन जगमगाना उसका एजेंडा नहीं था। सुशासन का ढोल तभी हकीकत बन सकता है, जब जमीन पर सुशासन दिखाई दे। इससे बड़ी बात क्या होगी कि बालाघाट जैसे इलाकों में बैगा आदिवासी रेत से छानकर कीड़ों वाला पानी पी रहे हैं।
राहुल गांधी के छात्रों की गूंज को झूट की गूंज बनाने में लगे भाजपा के नेता-मंत्री अगर सही में राहुल की मेगा एंट्री को रोकना चाहते हैं तो उन्हें पोस्टर-बैनर अभियान में जबानी जमा खर्चने के बजाय उन कॉलेजों-होस्टल्स का चक्कर लगाना चाहिए, जहां ये बच्चे घर-बार छोड़कर आ रहे हैं। परीक्षा के लंबे इंतजार में करियर को दावं पर लगा रहे हैं। नौकरियों में चयन होने के बाद भी बारी का इंतजार कर रहे हैं।
सिर्फ इंस्टा की भाषा बोलकर वहां ओजी (ओरिजनल गैंगस्टर), नाराज फूफा बोलकर बात नहीं चलेगी। जेन-जी भाषा से नहीं, उनके मुद्दों पर बात चाहती है। इंस्टा में उनकी जगह हथियाना राजनीति का बुरा आइडिया है। वह जेन-जी जो डेट पर बगैर नहाए जा रहा हो, ऑफिस में बरमुड़ा पहन रहा हो, बड़े आदर्शों और नैतिकता के पाठ को पॉलिएस्टर बता रहा हो, उससे निपटने के लिए मेगा इवेंट की नहीं, नेतागीरी को भूलने की जरूरत है।