मां ने कहा- ‘पता कर, सच में मिला क्या...!’

“जब फोन आया और बताया कि लता मंगेशकर पुरस्कार के लिए मुझे चुना है, तो यकीन नहीं हुआ। मेरी मां ने कहा कि पता करो क्या सच में तुम्हें ही दे रहे हैं, तब मैंने कहा कि लग तो ऐसा ही रहा है। सच कहूं तो मुझे यकीन नहीं था। खय्याम साहब से शुरू हुआ और मेरा नाम... किसी चमत्कार से कम नहीं है। लता जी की आवाज को सुनकर बड़ा हुआ और जिस शहर में मैंने कई कार्यक्रम किए, उसी में मुझे ये सम्मान मिलना मेरे लिए सरप्राइज है।”
इंदौर कितनी बार आए हैं?
मेरे दोस्त स्वानंद किरकिरे के साथ कई बार आया हूं। कार्यक्रम भी किए हैं। मासूम शहर है। मैं चूंकि लखनऊ का हूं, इसलिये ऐसा माहौल बहुत मिस करता हूं।
क्या लताजी से मुलाकात हुई?
लताजी के गाने सुनकर बड़ा हुआ। जब बड़ा हुआ, तो सलिल चौधरी से मुलाकात हुई। सलिल दा ने लताजी से बेमिसाल गाने गवाए। जब भारतीय सिनेमा के सौ साल पूरे हुए, तब एक गाना बनाने की जिम्मेदारी मुझे दी गई, जिसमें बीस गायकों को गवाना था और उसी सिलसिले में लताजी से मुलाकात हुई। इस बात को पन्द्रह साल हो गए हैं। तय हुआ कि स्टूडियो में मुलाकात होगी। मुझे रातभर नींद नहीं आई। चार लाइन की रिकार्डिंग थी। वो आईं और बोलीं कि आप मेरे संगीतकार हैं, आप जो दिखाएंगे, उसी पर चलूंगी। यह मत सोचना कि लता मंगेशकर हूं और संकोच मत करना। मुझसे बंगाली में बात कर रही थीं। मैंने पूछा बंगाली कैसे आती है, तो बोलीं कि इंडस्ट्रीज में ज्यादातर संगीतकार और निर्देशक बंगाली हैं ऋषिकेश मुखर्जी, एसडी बर्मन, शक्ति सामंत, बंगाली सीखना पड़ी। दूसरे दिन लताजी का फोन आया और बोलीं कि गाने की तीसरी लाइन और बेहतर गा सकती हूं। संगीत के लिए ये निष्ठा झकझोर गई। चार लाइन थी, जिसके लिए रातभर उन्होंने सोचा और सुबह मुझसे बोलीं कि एक लाइन और बेहतर कर सकती हूं, ऐसी थीं लताजी।
जिंदगी का टर्निंग पाइंट क्या था?
जब दिल्ली से आया, तब मेरा कोई सपना नहीं था। सोचा था थोड़े दिन मुंबई में रहूंगा और चला जाऊंगा, पर एक गाने ने मेरी जिंदगी बदल दी। वो था फिल्म ‘परिणीता’ का ‘पीहू बोले…।’ निर्देशक प्रदीप सरकार बोले कि हुनर है, तो अवाम तक लेकर जा, तेरा संगीत दिल को छुएगा। जब ‘परिणीता’ फिल्म मिली, तब दौर अलग था। मुझे शक था कि गाने चलेंगे या नहीं, पर प्रदीप सरकार ने कहा कि ये गाना ही तेरी पहचान बनेगा और हुआ भी यही। इस गाने ने मेरी तकदीर बदल दी और उसके बाद मैं मुंबई का होकर रह गया।
संगीत की शुरुआत कैसे हुई?
प्रदीप सरकार ने ही मौका दिया था विज्ञापन में जिंगल बनाने से। ‘अंकल चिप्स’ का विज्ञापन था और बस वहीं से…।
आपने शुभा मुद्गल से रॉक सांग गवाया, ये कैसे संभव हुआ?
दरअसल शुभा मुद्गल के साथ एलबम बनाया था ‘अब के सावन।’ पांच गानों की रिकार्डिंग हो चुकी थी, छठवां बाकी था। मैं घबरा रहा था, क्योंकि वह गाना कुछ अलग था। प्रसून जोशी ने लिखा था। एक दिन शुभा जी बोलीं कि ये छठवां गाना मुझे कब सुनाओगे। मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी कि मैं उन्हें सुनाऊं, तो प्रसून बोले कि जब सुनाना नहीं है, तो संगीत बनाया क्यों। शुभा जी बहुत शॉर्प हैं, समझ गईं कि छठवें गाना में कुछ ऐसा है, जो मुझे बताने में संकोच हो रहा है और एक दिन स्टूडियो में आकर बोलीं कि आज तो गाना सुनकर ही जाऊंगी। मैंने पहले तो माफी मांगी, तो बोलीं कि ऐसा क्या है जो माफी मांग रहे हो। मैंने कहा कि अभी तक सूफी सुनते आए हैं, पर मैंने रॉक सिंगर की कल्पना की है और ये वैसा ही गाना है। उन्होंने गाना सुना और बोलीं कि इसकी रिकार्डिंग एक बार में ही करना, क्योंकि ये हाई-पिच सांग है। जब गाना रिकार्ड हुआ, तो जैसे चमत्कार हो गया। वो गाना था ‘अब के सावन ऐसे बरसे, जिया तरसे…।’ ये शुभा जी का अकेला गाना है, जो उन्होंने रॉक स्टाइल में गाया है।
आज के संगीत पर क्या कहेंगे?
कोविड के समय सोनू निगम का फोन आया और बोले कि एक गाना सोशल मीडिया पर बहुत चल रहा है कि ‘भगवान तू है कहां…’ और ये गाना इस कठिन समय में लोगों को बहुत हिम्मत दे रहा है। मेरे कहने का मतलब ये है कि आज जैसा भी संगीत बन रहा हो, आपका काम संगीत बनाना है। लोग उसे ले लेंगे, जब जरूरत पड़ेगी। चंद सुनकार भी अगर मिल जाएं, तो काफी है, बाकी तो बोनस है।यही मेरी जिंदगी कि फिलासाफी है। रहा सवाल आज के संगीत का, नई पीढ़ी अच्छा काम कर रही है। अच्छी कविता लिखी जा रही है, पर उन्हें मौके नहीं मिल पा रहे हैं। फिल्म बनाने वाले युवा पीढ़ी के टैलेंट को फिल्मा नहीं पा रहे हैं, पर मेरा विश्वास है कि कोई भी चीज ज्यादा दिनों तक गायब नहीं हो सकती। फिर दौर आएगा, फिर कोई गाना हिट होगा। जब फिल्म ‘परिंदा’ बनी, शुरुआत में नहीं चली, पर आज ये फिल्म बुक्स मटेरियल है, मिसाल है। कई बार एक दौर निकल जाता है, फिर उस काम को मुकाम मिलता है, इसलिये हमारा काम है, जो सही लगता है, वो करते रहें, जब समय बदलेगा, तब कोई न कोई उसे वापस सुनेगा। ‘बावरा मन देखना चाहे सपना…’ आज भी लोग सुनते हैं, इसलिये मेरा ये कहना है कि हमेशा ऑडियंस को मत देखिये, अपने आपको भी देखिये। संगीत अच्छा है, तो दिलों में जगह बना ही लेगा।
किस गायक की तमन्ना है?
मौका नहीं मिला मन्ना डे के साथ काम करने का और ये तमन्ना अधूरी रह गई। सभी गायक आवाज दे चुके हैं। विशाल शर्मा के साथ काम करना है। मेरा संगीत ही मेरी पहचान हो और ऐसा संगीत बनाऊं, जो सदियों तक याद रहे, बस मेरी यही तमन्ना है।