बीज बबूल का... आम की चाह!

· Indore

बीज बबूल का... आम की चाह!

बुद्ध ने शिष्य आनंद से कहा था- कुछ घोड़ों को अगर चाबुक से मारा जाए, वह ठिठक जाते हैं, जहां के तहां खड़े रहते हैं, जिद्दी होते हैं। कुछ घोड़े इशारा मिलते ही चल पड़ते हैं। कुछ ऐसे भी होते हैं, जिन्हें सिर्फ चाबुक की आवाज आए, दौड़ पड़ेंगे। ‘हेरत हेरत हे सखी, रहा कबीर हिराई।’ खोजने वाले को खोजा नहीं जा सकता, क्योंकि वह खोज में खो जाता है। कबीर हेरफेर करते, टेर लगाते खुद गूंज बन गए। अच्छे घोड़ों के लिए चाबुक की छाया ही काफी है।

सियासी घोड़े किसी सीमा को नहीं मानते। वह बस दौड़ना जानते हैं। कौन सियासी घोड़ा अस्तबल में रहना चाहेगा। सबकी दौड़ सत्ता तक। मिल जाए तो जीवन सफल। ना मिले, फिर भी कुछ ना कुछ तो मिल ही जाता है।

गालिब ना हो दुनिया में,

तो कुछ ऐसा ज़रर (अफसोस नहीं),

दुनिया हो और दुनिया में,

मेरा बादशाह हो!

सत्ता से दूर रह जाने वाले भी सरकार बनाने-बिगाड़ने के खेल में तो शामिल हो ही सकते हैं। खुद ना बन सको, अपना बादशाह बनवा दो। इतना तो हर सियासतदान कर ही लेता है। किंगमेकर से दोस्ती तो की ही जा सकती है। अखिलेश सरकार में ओ.पी. राजभर मंत्री ना बन सके तो आदित्यनाथ की सरकार में बन गए। रेवंत रेड्डी कभी संघी हुआ करते थे, अब तेलंगाना में कांग्रेस के मुख्यमंत्री हैं। और दुनिया को कांग्रेसी होने का मतलब समझा रहे हैं।

भगवत भजन भी राजनीति में सत्तावंदन का ही दूसरा नाम है। सारा अध्यात्म, हर पूजा-पाठ ही मकसद के लिए। लगन लगी ऐसी, सजन कलकत्ता चले गए, दुलत्ती खाकर भी नहीं लौटे। एक बार जो सत्ता की खोज में निकला, फिर वापस नहीं आया। हिमालय से वापसी मुमकिन है। राजधानी से कोई नहीं लौटता। गया, फिर वहीं का हो गया। फिर राम नमामि, नमामि, नमामि हरे। सारी भागदौड़ एक ही मंजिल के लिए और वह मंजिल रामद्वारा नहीं होती।

सत्ता के द्वार पर ही गिरते-पड़ते हैं। पैर पकड़ते, पटकते, मटकते, ठहर जाते हैं। कोड़े की छाया काफी है, दौड़ लगाने के लिए। सत्ता का चाबुक दौड़ाए रखता है। हलकान कर देती है। पसीने में लथपथ आदमी दौड़ता है। एक ही अग्निपथ, अश्रु-स्वेद-रक्त में सराबोर। ऐ मेरे हमसफर, इक जरा इंतजार। ये सदाएं दे रही हैं मंजिल प्यार की। सत्ता से प्यार ही असली प्यार है। ईश्वर-भक्ति भी संदेह के दायरे में है।

सत्ता की चाह जीवन का सबसे भरोसेमंद रिश्ता है। एकदम जमीनी सच्चाई। दिग्विजयसिंह के शब्दों में- सौ टंच माल। खालिस सत्य, जरा भी मिलावट नहीं। एक वही धनवान है गोरी, बाकी सब कंगाल। रंग चांदी जैसा सोने जैसा बाल। पंकज उधास फिदा हो गए थे, पर सत्ता का रंग और गोरा है। काजल की कोठरी है, पर देह चमचमाती है। सत्ता का चेहरा दमकता है। दिन-रात दिपदिपाता है। ऐसी कमनीय काया के लिए कौन नहीं मचलेगा। उम्र की कोई सीमा नहीं। पचासी के शरद पवार, चौरासी के मल्लिकार्जुन खरगे, छप्पन के राहुल गांधी, पचहत्तर पार नरेंद्र मोदी सब बराबर। सबकी लगन में वैसी हा आग है। जाम छलक रहा है, चाहत का। साबुन की टिकिया में बहुत झाग है। दाग है तो धुल भी जाएंगे, फिर सब मिलकर फाग गाएंगे। मंगल गीत बजेंगे, सत्ता का राजतिलक होगा।

नितिन नवीन का हो गया, क्योंकि वह पचास पार नहीं हुए, राहुल गांधी बरसों से पचास पार हैं, अखिलेश भी हैं, पर साठ पार नहीं हुए, खरगे पचासी पार हैं, पर दलित हैं, तेजस्वी की ताकत यह है कि वह भी नितिन नवीन की तरह पचास पार नहीं हुए। मुरली मनोहर जोशी पचहत्तर पार हो गए थे, इसलिए वह जसवतंसिंह और आडवाणी के साथ जमना पार भेज दिए गए। भारतीय राजनीति का यह उम्र चरित है। आजादी का उत्तरकांड। अक्ल की नस्ल से और आयु से पैमाइश का शुद्ध देसी फार्मूला। दुनिया में कहीं भी ऐसा नहीं होता। ब्रिटेन में कीर स्टार्मर गए, एंडी बर्नहैम आए, पर इसलिए नहीं कि उम्र कम थी या ज्यादा। लेबर पार्टी आएगी को कंजरवेटिव जाएगी। सीधी बात है, पर भारत में ऐसा नहीं होता। हम नया नेता लाते हैं तो यह नहीं देखा जाता है कि वह काबिल है या नहीं। बस नया लगना चाहिए। नया लगने के लिए युवा दिखना चाहिए। आडवाणी की तुलना में नरेंद्र मोदी युवा थे, मोदी की तुलना में राहुल गांधी की उम्र कम है, राहुल की तुलना में नितिन नवीन जवान हैं। इतना काफी है किसी नेता के लिए, हिंदुस्तान की सियासत यही कहती है, यही सिखाती है। आदमी पचासी का हो या पच्चीस का, गदह पचीसी से नाता दोनों का हो सकता है। ना उम्र बढ़ने से अकल आती है, ना कम होने से। अनुभव जरूर कम या ज्यादा हो सकते हैं। बीज आम का है तो आम ही लगेगा। उम्र के साथ वह भटकटैया नहीं बन जाएगा। संतरे का फल जवानी में भी नींबू जैसा लगे, पर नींबू नहीं होता, संतरा ही रहता है।

हम भारतीय सियासत में इसके ठीक उलट समझ रखते हैं। हमें लगता है युवा नेता सब बदल देगा। जेन-जी का शोर सिर पर हावी है। चारों तरफ युवाओं का मजमा। नेपाल में भी लगा था, क्या हुआ। बालेंदु शाह के पौ बारह हुए, नेपाल की सुबह नहीं आई। युवा राजनीति का मतलब सिर्फ छात्र आंदोलन नहीं होता। सोच में रवानी होनी चाहिए। वह न उम्र के साथ आती है, न जाती है। समझदार घोड़ों को कोड़े फटकारने की देर-अबेर जरूरत नहीं पड़ती। वह इशारा पाते ही दौड़ पड़ते हैं। अक्ल घास चरने गई हो तो चार कदम भी नहीं चल पाएंगे, उम्र चालीस की हो या चौरासी की।