आगे-आगे बोल, पीछे-पीछे खेद!

· Indore

आगे-आगे बोल, पीछे-पीछे खेद!

मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के बयान बेहिसाब हैं। महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों के बीच (जनवरी 2013) उन्होंने कहा था कि मर्यादा तोड़ी जाती है तो सीता हरण हो जाता है। हर एक के लिए लक्ष्मण रेखा है और उसे पार करने पर सामने रावण बैठा है। विवाद बढ़ा तो भाजपा को दूरी बनानी पड़ी और कैलाश को कहना पड़ा कि उनका मकसद किसी की भावना को ठेस पहुंचाना नहीं था।

नीतीश कुमार के गठबंधन (2022) बदलने पर उन्होंने कहा कि विदेश में किसी ने उन्हें बताया था कि वहां लड़कियां जैसे बॉयफ्रेंड बदलती हैं वैसे ही बिहार की राजनीति है। मामला बिगड़ा तो सफाई आई कि मित्र की कही बात थी। साथ में यह भी आया कि नारी उनके लिए पूजनीय है।

इंदौर के धार्मिक कार्यक्रम (अप्रैल 2023) में उन्होंने कहा कि लड़कियां इतने गंदे कपड़े पहनकर निकलती हैं कि उनमें शूपर्णखा लगती हैं। उसी भाषण में नशे में झूमते युवाओं को पांच-सात थप्पड़ लगाने की इच्छा भी जाहिर कर दी। जून 2025 में कपड़ों पर फिर राय दी। बोले कि उन्हें कम कपड़े पहनने वाली लड़कियां पसंद नहीं और ऐसी लड़कियां सेल्फी लेने आएं तो पहले ढंग के कपड़े पहनकर आने को कहते हैं।

राहुल गांधी के अपनी बहन प्रियंका गांधी को चूमने (सितंबर 2025) पर भी उन्हें भारतीय संस्कृति खतरे में दिखाई दी। उन्होंने इसे संस्कारों का अभाव और विदेशी संस्कृति बता दिया। विरोध हुआ तो रिश्तों की पवित्रता और सीमा समझाने लगे। इंदौर में दो ऑस्ट्रेलियाई महिला क्रिकेटरों से छेड़छाड़ हुई तो विजयवर्गीय ने कहा कि खिलाड़ियों को होटल से निकलने से पहले अधिकारियों को बताना चाहिए था और इस घटना से वे भी सीख लेंगी। अपराधी ने छेड़छाड़ की, लेकिन सीख महिलाओं को दी गई।

शाहरुख खान पर बोले कि भारत में रहते हैं, लेकिन उनका मन पाकिस्तान में रहता है। विवाद हुआ तो ट्वीट वापस ले लिया। कांग्रेस के लिए ‘चॉकलेटी चेहरे’ बोले, फिर कहा कि इशारा प्रियंका गांधी की तरफ नहीं था। अपने घर पर काम करने वाले मजदूरों को पोहा खाते देखकर उनके बांग्लादेशी होने का शक हो गया। अग्निवीरों को भाजपा दफ्तर में गार्ड रखने की बात कही फिर बयान तोड़ने-मरोड़ने का आरोप लगा दिया। भागीरथपुरा में खराब पानी से मौतों के बीच पत्रकार ने सवाल पूछा तो ‘घंटा’ ऐसा गूंजा कि चुप होना पड़ा। तब भी माफी आई। कुछ महीने बाद कहा कि जो लोग हमें काफिर मानते हैं वे हमारी बनाई सड़कों पर न चलें और लाड़ली बहना योजना का पैसा भी न लें।

इस बार उन्होंने पार्षद संध्या की चौड़ाई नापी है लेकिन असली जरूरत शब्दों के उथलेपन को घटाने की है क्योंकि खेद कोई सफाई वाहन नहीं है जो हर बार बयान से फैली गंदगी उठाकर ले जाए।