अंधभक्तों को पढ़ाने आए राहुल गांधी...!

· Indore

श्रेया मंडलोई
श्रेया मंडलोई

पुणे, प्रयागराज और कोटा में राहुल गांंधी ने सरकारी नौकरी, नीट, महिलाओं पर बात की, लेकिन इंदौर में मुद्दा अंध-भक्ती चुना और बताया, सरकार नहीं चाहती कि बच्चे पढ़-लिख कर सवाल करें। लपेटे में यूपी को भी लिया और बताया कि एक लाख स्कूल बंद किए, ताकी अंध-भक्ति का व्यापार चलता रहे।

आदिवासी औैर दलितों पर बात की, जिन्हें शिक्षा बराबरी का हक दिलाती है। घंटे भर की बातचीत में राहुल ने सरकार पर सवाल दागे और जाहिर भी नहीं होने दिया कि विपक्ष का नेता बोल रहा है। देवास से आए परिवार ने जब सज्जन स्ंिाह वर्मा और मनोज राजानी का नाम लिया, तो खुसर-फुसर होने लगी। मप्र की बात करने आए राहुल ने बीसीसीआइ मुखिया रहे जय शाह को तो आड़े हाथ लिया, लेकिन मप्र क्रिकेट में ज्योति सिंधिया के सुपुत्र की ताजपोशी पर बात नहीं की।

अंध-भक्तों को पढ़ाने की बात पर छब्बीस दिन भंवरकुआं चौराहे पर धरने पर बैठीं दुर्गा मंसारे और टीम ने कहा कि हमारा समाज अंधभक्ति में सबसे आगे है। जन्मदिन पर दीपक जला रहे हैं। इसीलिए तो हमें नहीं पढ़ाते, ताकि इसी तरह इनकी भक्ति करते रहें। भीड़ में मप्र के पहले मुख्यमंत्री भगवंतराव मंडलोई के परिवार की लडक़ी श्रेया मंडलोई भी थीं। खंडवा से हैं। यूथ कांग्रेस से जुड़ी हैं। बोलीं कि सरकार धर्म की राजनीति करती है, मुसलमानों से खतरा बताती है। जब देश का प्रधानमंत्री सिख और राष्ट्रपति मुसलमान था, तब कुछ नहीं हुआ तो अब प्रमुख पदों पर हिंदू बैठे हैें तो मुसलमान हमें मारने पर आमादा हैं। युवाओं को भटकाने का काम कर रहे हैं। शिक्षा, बेरोजगारी, महंगाई और महंगाई पर बात करने से घबराते हैं।

मेधा जाधव लाडली लक्ष्मी योजना से नाराज हैं। कहती हैं, सरकार पंद्रह सौ देना बंद करे और यह पैसा शिक्षा पर खर्च करे। हमारी मम्मी को ये पैसे नहीं चाहिए। पंद्रह सौ देकर सिलेंडर, शिक्षा, शक्कर के भाव बढ़ा दिए हैं। वो कमा लेगी और हम भी कमा लेंगे। नीट की तैयारी कर रहीं सुहाषि, पिता राजेंद्र कुशवाह के साथ आईं थीं। राजेंद्र बोले कि बेटी को इसलिए लेकर आया हूं कि अगर पेपर लीक हो जाए तो गलत कदम ना उठाए। बताने आया हूं कि उसकी खातिर कितने लोग इकट्ठा हैं। सरकार से सवाल पूछ रहे हैं।

वकील कैलाश परिहार लडक़ी खुशी के साथ आए थे। कहा, इंदौर एजुकेशन हब है। प्रदेशभर के बच्चे सपने लेकर आते हैं कि पढ़-लिख देश बदलेंगे, लेकिन यहां पहुंचते ही फीस नहीं भर पाते। क्लास रूम में बैठने से पहले पैकेज पकड़ा दिया जाता है। सभी को मुफ्त शिक्षा मिलना चाहिए। पुराने भारत में यही व्यवस्था थी। या कोर्स के हिसाब से फीस तय कर दी जाए। राहुल को पीएम बनाने का सवाल हुआ तो बोले पढ़े-लिखे हैं, पीएम बने तो सुधार होगा। खुशी कहती हैं कि इस बार खूब पेपर लीक हुए। उम्मीद है कि इन पर लगाम के साथ वक्त पर परीक्षा कराने का इंतजाम भी होगा।

गूंज तो हुई... पर असर गायब था!

बीस ओवर क्रिकेट की तरह था राहुल गांधी का छात्रों की गूंज, जिसमें खाना-पीना, मौज-मस्ती, गाना-बजाना सब था, लेकिन मैदान का मजा गायब था। राहुल ने नेताओं वाले लटके-झटके नहीं दिखाए... ना कोई भाषणबाजी थी। अंध-भक्ति थीम लेकर आए थे और उसी को पकडक़र रखा, लेकिन मप्र से जिन बोलने वालों को चुना था, कमजोर रहे।

राहुल से उम्मीद थी कि रोंगटे खड़े कर देंगे, या कोई छात्र ऐसा किस्सा सुना देगा कि उसका सुबकना सोने नहीं देगा... पर ऐसा कुछ हुआ नहीं। आपबीती सुना रहे थे तो कैमरों ने कुछ चेहरे ढूंढे भीं, लेकिन आंख किसी की भरी नहीं, जबकि बच्चों से अकेले बात करो तो फफक पड़ते हैं।

सभी बारी-बारी से आए, अपनी बात रखी, जो आंदोलन में कई दफा सुन चुके हैं। कुछ ने मौके का फायदा उठा बात लंबी खींची, लेकिन कुछ ऐसा नहीं दे पाए जो सोचने पर मजबूर करे। ले-देकर राहुल के आंकड़े थे जो बता रहे थे कि मप्र के बच्चों से शिक्षा का अधिकार छीना जा रहा है। सरकार ने पढ़ाई के लिए पैसा देना बंद कर दिया है। सरकारी हॉस्टल होते तो दिल्ली में बच्चों की मौत नहीं होती। छात्र किसी को झेल भी इतना ही सकते हैं। ऐसा लग रहा था कोई मंचन चल रहा है, जिसमें हंसी-मजाक के बीच बारी-बारी से किरदार आ रहे थे। कुछ कमजोर तो कुछ ठीक-ठाक।

जनता का मन उठता, उससे पहले ही पर्दा गिर गया। भीड़ के नजरिए से शो हिट था। जितने अंदर थे, उतने ही बाहर। राहुल की झलक नहीं मिलने पर बहुतेरे निकल गए थे, लेकिन बाकी ने जगह नहीं छोड़ी। अंदर तो ठीक, बाहर लगी स्क्रीन पर भी बैठे रहे। पहली बार इंदौर ने राहुल के लिए कान धरे हैं, जिनको हमेशा से जुमलों की आदत है। काम की बात खत्म होते ही राहुल हाथ हिला कर निकल गए तो लगा जैसे बिना गुलाब जामुन और मूंग-हलवा के शादी निपटा कर आए हैं।