भाषा की सरलता और आक्रोश भी!

· Indore

आदिवासी है, वनवासी नहीं... जसिंता केरकट्टा
आदिवासी है, वनवासी नहीं... जसिंता केरकट्टा

किताब-उत्सव में या तो कलापिनी कोमकली को सुना गया या फिर जसिंता केरकट्टा को, एक में माधुर्य हैं, कोमलता हैं तो दूसरी में भाषा की सरलता और आक्रोश! जसिंता नदी के प्रवाह की तरह बोलती ही जाती हैं और सवालिए (अजय सोडानी) को मौका नहीं मिलता। एक ही सांस में दो-तीन सवाल पूछ डाले, जिसका एक-एक कर जवाब दिया। जसिंता (43) ने लम्बी यात्रा कर ली है, जिसमें झारखण्ड के जंगलों से यूरोप तक का सफर है, लेकिन थकान नहीं है, गुस्सा जरूर है, ये गुस्सा पिता के जातिगत अपमान का है, स्त्री होने के प्रतिबंधों का हैं और आदिवासियों को वनवासी कहे जाने या निचला समझे जाने का है। इसीलिए जब आदिवासियों को मुख्य धारा में लाने कि बात निकलती हैं तो वे “तथाकथित मुख्य धारा” कहती हैं।

दरअसल जिसे भी मुख्यधारा का ‘ज्ञान’ देने का शोक हो उसे जसिंता से जरूर मिलना चाहिए या उन्हें जरूर सुनना चाहिए, जाले साफ हो जायेंगे!

जसिंता कहती हैं कि खुद को आदिवासियों से श्रेष्ठ क्यों समझते हो? मुख्यधारा के नाम पर आदिवासियों से उनकी पहचान ली जा रही है। वनवासी और आदिवासी में अंतर है पर कहती हैं कि हम आदिवासी हैं, वनवासी नहीं। सदियों पहले हम अपनी संस्कृति अपने धर्म को लेकर जंगलों में चले गए, हम अपने इलाकों में घुसपैठिये पसंद नहीं करते, हमारा अपना धर्म हैं, हमारी अपनी पहचान हैं, जब अंग्रेज आये तो उन्होंनें उनसे संघर्ष किया। बिरसा मुंडा, अंग्रेज और हिन्दू जमींदारों को एक जैसा ही मानते थे। जमींदारों के सताए आदिवासियों को घर बार छोड़ कर जंगलों में भागना पड़ता रहा है।

यहाँ उन्होंने ईसाई मिशनरी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के काम बताये कि मिशनरीज ने आदिवासियों के बीच जब काम शुरू किया तो पहले पांच साल तक कोई आदिवासी ईसाई नहीं बना फिर मिशनरीज ने ढंग बदला, आदिवासियों की पहचान कायम रखी, उनकी भाषा सीखी, उनकी संस्कृति सीखी और फिर उन्हीं में से जिम्मेदार भी बनाए, वे कहती हैं मिशिनरीज ने हम पर कुछ थोपा नहीं, हमारे जैसे बने!

फिर संघ ने मिशिनरी की नकल में काम शुरू किया। पहले वे कहते रहे कि आप और हम एक जैसे हैं आप भी पेड़ की पूजा करते हैं और हम भी, लेकिन उनमें बेईमानी थी। संघ ने आदिवासियों को हिन्दू कहना शुरू कर दिया। संघ की वज़ह से आदिवासियों में अलगाव आया, हिंसक बने। झारखण्ड में ओराव जनजाति का संघर्ष हुआ। जो आदिवासी नफरत नहीं जानते थे, उन्हें दंगों में इस्तेमाल किया और कई आदिवासी दंगों में शामिल होते रहे हैं।

आधुनिकता और मुख्यधारा को कठघरे में खड़ा करते कहती हैं कि “आदिवासी अपनी जिंदगी अच्छे से जी रहे थे, जब से मुख्यधारा और सोशल मीडिया आया है आदिवासियों में अविश्वास और डर का माहौल बढ़ा है। पहले आदिवासी महिलाएं जंगलों में अकेले चली जाती थीं, गैंग रेप का नाम भी नहीं सुना था।

सवाल आया “आप और हम का फर्क क्यों” यही वो मौका था, जिस पर जसिंता ने छक्का मार दिया..! जवाब बेबाक था “ आप और हम अलग अलग हैं, आप भिन्नता का सम्मान क्यों नहीं करते, अपने से अलग का सम्मान क्यों नहीं करते, प्रेम में हम क्यों एक जैसे हो जाएँ, हम अलग अलग होकर भी तो प्रेम कर सकते हैं।“ यहाँ जसिंता ने वो बात कह दी थी, जिससे सामान नागरिक संहिता को बारीकी से समझा जा सकता हैं, कि:- आखिर सबकी परम्परा- रीति-रिवाजों को एक जैसा बनाने की जिद क्यों? क्यों कोई सात फेरे या कुबूल हैं, कुबूल हैं, के साथ शादी करे...!

बहरहाल जसिंता जवाब देती जा रही थीं और सवाल खत्म नहीं हो रहे थे, लोग भी उन्हें तबियत से सुन रहे थे जिन्हे कुर्सी नहीं मिली खड़े- खड़े सुन रहे थे। “पढ़ने-पढ़वाने” पर बातचीत शुरू हुई जिसमें अज़ीज़ इरफ़ान, संध्या गंगराडे,माना वेद,अपूर्व बनर्जी, बहादुर पटेल और राधेश्याम माहेश्वरी से संजय पटेल को बातचीत करना थी। जिस तरह पढ़ने वाले तेजी से कम हुए हैं उसी तरह इस बातचीत सुनने वाले भी कम हो गए और आधी कुर्सियां आराम की मुद्रा में आ गई। अल्बता इस बातचीत में अपूर्वा बनर्जी ने तसल्ली की बात कही कि पब्लिक स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र भी हिंदी में दिलचस्पी ले रहे हैं।

मनीष वैद्य ने देवास में पढ़ने पढ़ाने के काम पर बात की। कह रहे थे कि किताब से पाठक नहीं बल्कि शहर बदलता है। अज़ीज़ इरफ़ान से उर्दू पढ़ने वालो के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा बुरे हाल हैं, कोई पढ़ता ही नहीं है, मेरा कोई पड़ोसी मेरे पास किताब लेने नहीं आता। भाषा की शुद्धता पर सवाल किया तो अज़ीज़ इरफ़ान उदास हो गए कि लोग तलफ्फुज़ पर ध्यान ही नहीं देते हैं और उर्दू का कबाड़ा कर रहे हैं। शायरी के शौकीन लड़के मशहूर तो होना चाहते हैं, लेकिन उर्दू पर मेहनत नहीं करते।

आखिर में किसी ने पूछा वो कौन सी किताब हैं जिसे पड़े बिना इंसान को मरना नहीं चाहिए, सब ने अपनी अपनी पसंदीदा किताब बता दी।