काश! मां-बाप का चेहरा देख पाती!

कुछ हादसे शरीर पर निशान छोड़ते हैं, कुछ पूरी जिंदगी पर। कश्मीर की इंशा मुश्ताक की कहानी अलग है। जुलाई 2016 में वह करीब चौदह बरस की थीं। घर की खिड़की से बाहर का माहौल देख रही थी कि पैलेटगन से निकले छर्रे उनके चेहरे और आंखों में आ लगे। कुछ ही पलों में वह दुनिया, जिसे इंशा रोज देखती थीं, हमेशा के लिए अंधेरे में चली गई। उस दिन इंशा ने सिर्फ रोशनी नहीं खोई, मां-बाप, छोटे भाइयों की शक्ल खो दी, गांव की गलियां, बाजार, फूल, पेड़, आसमान और पानी का रंग खो दिया। आज करीब दस बरस बाद भी उसकी सबसे ख्वाहिश बड़ी नौकरी, पैसा या शोहरत नहीं है, वह सिर्फ इतना चाहती है कि एक बार माता-पिता का चेहरा फिर देख पाती। इंशा डॉक्टर बनना चाहती थीं। जिंदगी ने रास्ता ही बदल दिया। कई महीने इलाज चला, उम्मीद टूटी, हिम्मत भी जवाब देती रही। फिर उसने ब्रेल सीखी और दोबारा पढ़ाई शुरू की। 2018 में दसवीं पास की, 2023 में बारहवीं और अब ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रही हैं। जिस लड़की से उसकी आंखें छीन ली गईं, उसने जिंदगी से हार मानने से इनकार कर दिया।
इंशा आज भी जिंदगी जी रही है, पढ़ रही है, घर के काम कर रही है और अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश कर रही है लेकिन उसकी बात अंदर तक चुभती है कि मां-बाप को फिर देख पाती। हम जिन चेहरों को रोज देखकर भी अनदेखा कर देते हैं, किसी के लिए वही चेहरा जिंदगी की सबसे बड़ी अधूरी ख्वाहिश हो सकता है।